کہیں صدف کہیں گوہر کی لاش پانی میں
چہار سمت ہیں پتھر کی لاش پانی میں۔۔

कहीं सदफ कहीं गौहर की लाश पानी में
च्हार सम्त हैं पत्थर की लाश पानी में..
سیاہ رات کے آنچل میں بلبلوں کا ہجوم
ڈبو رہا تھا بونڈر کی لاش پانی میں۔۔

सियाह रात के आंचल मे बुलबुलों का हुजूम
डुबो रहा था बवंडर की लाश पानी में..
یہ سوچ کر کہیں تفتیش میں نہ پھس جاؤں
میں پھینک آیا سمندر کی لاش پانی میں۔۔

ये सोच कर कहीं तफ्तीश मे ना फस जाऊँ
मैं फेंक आया समन्दर की लाश पानी में..
زمانہ دیکھ رہا تھا کھڈا کنارے سے
ہمارے جلتے ہوے گھر کی لاش پانی میں۔۔

ज़माना देख रहा था खड़ा किनारे से
हमारे जलते हुए घर की लाश पानी में..
خورچ کے آنکھ کی پتلی سے پھینک آیا ہوں
تمہارے شہر کے منظر کی لاش پانی میں۔۔

खुरच के आंख की पुतली से फेंक आया हूँ
तुम्हारे शहर के मंज़र की लाश पानी में..
رواں تھا امن کا دریا جہاں پے اے عمران 
وہیں پڑی تھی کبوتر کی لاش پانی میں۔۔

रवां था अम्न का दरिया जहां पे ए "इमरान"
वहीं पडी थी कबूतर की लाश पानी में..
 ...عمران فاروقی... 

Imran farooqui

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